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कोरोना की लुका-छुपी और ज़िन्दगी

ये तो कोई नई बात नहीं है कि जब से कोरोना आया है, ये दुनिया काफ़ी कुछ बदल गई है. पर आजकल जो हाल हैं वो कुछ ऐसे हैं, जैसे हम अंधेरी रात में किसी जंगल से गुज़र रहे हैं और कब शेर आकर किसे उठा ले जाए, कुछ कह नहीं सकते. जंगल से गुज़रना भी है, खुद को और अपने साथ वालों को दिलासा भी देना है कि अब शेर नहीं आएगा, पास आती शेर की गुर्राहट का आकलन भी करना है कि शेर सचमुच आ रहा है या ये केवल हमारा वहम है! शेर दो बार आकर हमारे कितने ही लोगों को ले गया, अब तीसरी बार आया तो भगवान जाने क्या होगा. हाथ में वैक्सीन का डंडा तो आ गया है, पर ये डंडा शेर को भगाने के लिए कारगर होगा या नहीं, पता नहीं, क्योंकि उसके नाखूनों और दाँतों में भी तो डेल्टा की नई धार आ गई है!

अब सुबह हो जाए और ये डरावना जंगल पार हो जाए तो हम भी चैन की साँस लें. पर कहते हैं कि कोरोना तो रहेगा और हमें इसके साथ जीना सीखना होगा. यानी ये दहशत, ये बच-बच कर चलना, ये मास्क, ये सैनिटाइज़र, ये एक दूसरे से दूर-दूर रहना क्या हमेशा रहेगा? ये सोचकर दिल बैठ सा जाता है.

पर निराशा की इस धुंध में कुछ उम्मीदों के दीये भी जल रहे हैं. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये संसार, ये ब्रह्मांड एक शक्ति ने बनाया है और वही इसको संचालित कर रही है, आज से नहीं, अनंत काल से, और उसी को हम परमात्मा, अल्लाह या गॉड कहते हैं.

अगर हम अपने आसपास ही छोटी-छोटी चीज़ों को देखें तो पाएंगे कि उसका रचा ये खेल कितना विशाल, कितना अनोखा और कितना चमत्कारिक है. अगर हमें खत्म ही होना हो तो उसका सामान भी हमारे आसपास खूब बिखरा है. तबाही या प्रलय एक पल में आ सकती है. उसके लिए किसी कोरोना की लंबी-चौड़ी भूमिका की ज़रूरत नहीं है.

कोई उल्का पिंड गिर सकता है. कोई परमाणु युद्ध हो सकता है. सूर्य से निकलने वाली हानिकारक किरणें धरती पर आ सकती हैं. हवा से ऑक्सिजन गायब हो सकती है. बादल फट सकते हैं. बारिश बंद हो सकती है. ज़मीन समुद्र में जा सकती है या समुद्र ज़मीन पर आ सकता है.

हो सकता है कि अनाज के दाने अंकुरित होना ही बंद हो जाएं! हो सकता है कि स्त्रियों को गर्भ ठहरना बंद हो जाएं! हो सकता है कि पत्थर से बनी ज़मीन पर गादी की तरह बिछी ये 10-15 फीट मिट्टी की परत बह जाए! हो सकता है कि चींटियाँ या साँप-बिच्छू या ऐसे ही अन्य जीवों की पैदावार बेतहाशा बढ़ जाए! या फिर पूरी पृथ्वी ही सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से खिंचकर उसमें जा समाए!

होने को कुछ भी हो सकता है, पर ये कभी होता नहीं, और होगा भी नहीं. प्रकृति ने गज़ब का संतुलन बनाकर रखा है. चींटी को कण और हाथी को मन भर मिलने की व्यवस्था उसी ने बनाई है. हमसे ज़्यादा खयाल उसको है इस दुनिया का. ये कोरोना वायरस तो उसके सामने कुछ भी नहीं.

हम भरोसा रखें उस बेहद कुशल ड्राइवर पर जो हमें यहाँ तक लाया है और घबराए यात्री की तरह बस में इधर-उधर दौड़ना छोड़ें. हम अपनी सीट पर इत्मिनान से बैठें और इस खूबसूरत सफ़र का आनंद लें, जिसे ज़िन्दगी कहते हैं.

फिर मिलते हैं, कोरोना के बावजूद भी!

आपका पवन अग्रवाल

13 Comments

  1. Rakesh kanungo says:

    बहुत बढ़िया भाई अब शायद करो ना नहीं आएगा

  2. Deepak Dogra says:
  3. Priya Agrawal says:

    Very nice

  4. Balendra Kumar says:

    Bahut khoob Bhai ♥

  5. Ashish Moyade says:

    बहुत सुंदर भाई, करोना की लड़ाई में हिम्मत तो मिली।
    अफगानी करोना पर भी लिखो।

  6. Madan Lal Pareek says:

    बहुत खुब भाई, अब तो जिसने हमें धरती पर भेजा है वो ही कोरोना से बचाएगा।
    लगे रहो पवन जी, जान में जान आ गई।
    कुछ अफगानियों के लिए भी लिखो।

    • Pawan says:

      जी धन्यवाद भाईसाब! अफगानिस्तान के प्रकरण पर भी जल्द ही लिखेंगे।

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