भगवान भरोसे…

हममें से बहुत से लोगों की एक शिकायत होती है, और वो ये कि हम इतने समय से पूजा-पाठ कर रहे हैं, फलाँ व्रत-उपवास कर रहे हैं, फलाँ दान-पुण्य कर रहे हैं, पर इतनी भाव-भक्ति और मान-मनव्वलों के बावजूद भगवान ने कभी हमारी ओर ध्यान नहीं दिया, कभी कोई चमत्कार नहीं दिखाया, जबकि उनको देखो, वो कभी मंदिर जाते नहीं, कभी किसी की मदद करते नहीं, इतने गलत काम करते हैं, फिर भी वो मज़े में है, फिर भी भगवान उन्हीं को छप्पर फाड़ के देता है.

‘जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है’, कई बार इस कहावत पर भी सवाल उठाया जाता है, क्योंकि हम देखते हैं कि कई लोग बुरे कर्म करने के बावजूद बड़े मज़े में रहते हैं और उन पर लक्ष्मी की कृपा निरंतर बनी रहती है. इसके उलट कई बार हमारे सामने कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्होंने अपना जीवन त्याग, ईमानदारी और भलमनसाहत के साथ गुज़ार दिया और फिर भी वे हमेशा मुसीबतों, परेशानियों, गरीबी और नाकामयाबी से जूझते रहे.

इसके लिए भाग्य को, पूर्व जन्म के कर्मों को दोष दिया जाता है. पर फिर भी हमारे सवालों और शंकाओं का समाधान नहीं हो पाता और ये कशमकश बनी रहती है.

साथियों, मैंने अपने जीवन में एक बात तो महसूस की है कि ‘चमत्कार’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती. हम जिन्हें चमत्कार समझते हैं, वो अक्सर संयोग या हाथों की सफाई या नज़रों का धोखा हो सकता है. कई ‘बाबा’ इसी प्रकार के चमत्कार दिखाकर जनता से नमस्कार करवाते हैं.

अब यूँ तो एक फूल का खिलना, या आसमान से बारिश होना, या बिजली चमकना, या एक बच्चे का पैदा होना, या एक बीज का पेड़ बन जाना, या सूरज का उगना या ऋतुएं बदलना, आदि-आदि भी किसी चमत्कार से कम नहीं है. पर हम जिन चमत्कारों की उम्मीद करते हैं, वो असल में कभी होते नहीं हैं. कभी रेगिस्तान में नखलिस्तान दिख भी जाए, तो ये भी एक स्वाभावितक प्राकृतिक घटना ही होती है.

खैर, हम असल मुद्दे पर आते हैं. अगर भजन-कीर्तन से कुछ नहीं होता है, तो क्या हम ये सब बंद कर दें? नास्तिक बन जाएं? या फिर अपनी आस्था पर अटल रहकर, अपनी तपस्या जारी रखकर भगवत्‌ कृपा का इंतज़ार करते रहें?

ये सवाल आदि काल से चला आ रहा है, मैं भी इतना सक्षम नहीं कि इसका जवाब दे सकूँ. क्योंकि ये विषय मन से जुड़ा है और मन तो चंचल होता है, सभी का मन और मर्ज़ियाँ अलग-अलग होती हैं. पर जहाँ तक मेरी बात है, मुझे लगता है कि ये सवाल ही गलत है. गलत इसलिए है, क्योंकि ये सवाल संतुलन बिगड़ने से ही पैदा होता है. कर्म और भक्ति का संतुलन बिगड़ने से. वैसे ‘कर्म और भाग्य’ एक ऐसी सनातन बहस है, जिसका कोई पार नहीं है. हम अक्सर दो लोगों को इस बहस में पड़े देख सकते हैं और इस बहस का आज तक कोई परिणाम नहीं निकल पाया है. खैर, इस विषय पर हम कभी और बात करेंगे. फिलहाल अपने विषय पर आएं.

तो भई, मुझे तो ऐसा लगता है कि ईश्वर एक कोच (प्रशिक्षक) की तरह होता है और हम एक खिलाड़ी की तरह हैं. जिस तरह एक कोच खिलाड़ी को खूब प्रशिक्षण देता है, खूब दाँव-पेंच सिखाता है, कुशल बनाता है, उसे जीतने के लिए तमाम संसाधन मुहैया करवाता है और उसे तैयार करता है, पर जब खिलाड़ी खेलने के लिए मैदान में उतरता है, तो उसे अकेले ही जाना पड़ता है. हमें भी भगवान ने जन्म देने से पहले यथासंभव सब तरह से तैयार किया, हमें अच्छा मन, अच्छा शरीर दिया, अच्छी चेतना दी, फिर दुनिया में भेजा… पर वो हमारे साथ नहीं आया… आए हम अकेले ही… उसके दिए हाथ-पैर, दिल-दिमाग लेकर, समझ-बूझ, बुद्धि-विवेक लेकर, और अब हमें खेलना है. जैसे खिलाड़ी का कोच पैवेलियन में खड़े होकर उसे खेलते हुए देख सकता है, वैसे ही ईश्वर हमें भी देखता है. जैसे कोच मैदान के बाहर से खिलाड़ी का हौंसला बढ़ाता है, उसे इशारे करके उसकी गलतियों का एहसास करवाने की कोशिश करता है, उसे इशारों से जीतने की युक्तियाँ बताता है, वैसे ही हमारा भगवान भी हमें इशारे करता है, हमारा हौंसला बढ़ाता है. पर बल्ला तो हमें ही घुमाना है, फुटबॉल को गोल पोस्ट तक हमें ही लेकर जाना है, कबड्डी-कबड्डी करते हुए दुश्मन के पाले में हमें ही घुसना है और उसे मारकर वापस भी आना है. हमारा कोच हमारे साथ मैदान में नहीं आ सकता, वो हमारी तरफ से नहीं खेल सकता, खेलना तो हमें ही है. वैसे ही हमारा ईश्वर हमें खुद आकर नहीं जिता सकता, कोशिश करके हमें ही जीतना पड़ेगा. हमारे साथ उसकी शिक्षाएं हैं, उसकी दी हुई चेतना है, ज्ञान है, गिरकर फिर उठने की हिम्मत है, सोचने के लिए दिमाग है, भाग-दौड़ करने के लिए हाथ-पैर हैं, साँस लेने के लिए हवा है, प्यास मिटाने के लिए पानी है, पेट भरने के लिए खाना है, और जीने के लिए ज़िन्दगी है. अब ये हम पर है कि हम उसके पास इस मैदान से जीतकर जाएं या हार कर, जीत कर जाएंगे तो वो खुश होकर गले लगाएगा, शाबासी देगा, हार कर गए, तो वो हमें उदास मन से सांत्वना देगा, ढाँढस बँधाएगा, और मन में अफसोस करेगा, कि इसे इतना तैयार करके भेजा, फिर भी…

तो दोस्तों, हम कोशिश करें कि भगवान के भरोसे नहीं बैठें, उसे अपनी लाठी नहीं समझें, उससे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करें, क्योंकि उसके चमत्कार तो हमारे आसपास सृष्टि में बिखरे पड़े हैं, उसके सबसे बड़े चमत्कार तो हम खुद हैं. इसलिए उसने हमें जो कुछ भी दिया है, उसके लिए उसका धन्यवाद कहें, उसका आभार मानें, उसके प्रति अनुग्रह भाव रखें और अपनी पूजा-पाठ, व्रत-उपवास भी इसी धन्यवाद भाव से करें, न कि शिकायतें करते हुए. और जो हमारे अभाव हैं, उन्हें खुद दूर करें, जो मुसीबतें हैं, उन्हें खुद पार करें, जो हमारे काम हैं, जो हमारे लक्ष्य हैं, जो हमारी मंज़िलें हैं, उन्हें हम अपने ही बल पर पाने की कोशिश करें. हमारी कोशिशों का क्या परिणाम होगा, ये उसी पर छोड़ दें.

प्रणाम!

आपका

पवन अग्रवाल

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