लोहा… प्लास्टिक… रद्दी पेपर वाला… कबाड़ वाला, भंगार वाला…
अक्सर गली में ठेला गाड़ी की खड़-खड़ के साथ सप्तम् स्वर में ये आवाज़ सुनाई देते ही हम अपने घर की पुरानी और फालतू चीज़ें ढूँढकर निकालने लगते हैं और उन्हें औने-पौने दाम पर बेचकर ‘हलके’ हो जाते हैं. ऐसे मौके पर अगर घर में दादाजी जैसा कोई बुज़ुर्ग है तो पुरानी चीज़ों को देने/न देने के विषय में अक्सर तर्क-वितर्क या बहसबाजी हो जाती है. आपके साथ-साथ कबाड़ी भी दादाजी को समझाता है कि दे दो, किसी काम की नहीं है. आखिर उसे तो ज़्यादा से ज़्यादा कबाड़ चाहिए होता है. आखिर में या तो दादाजी की चलेगी, या फिर वो भुनभुनाते-बड़बड़ाते रह जाएंगे.
खैर, दादाजी कितने सही हैं, ये समझने के लिए आपको दादाजी की उम्र तक पहुँचना होगा. पर फिर भी पुरानी चीज़ों से छुटकारा पाने में ज़्यादा जल्दबाज़ी न करें. क्योंकि हर पुरानी या बेकार लगने वाली चीज़ कबाड़ नहीं होती है. हो सकता है कि उनसे आपकी या आपके पिता या दादा की ज़िन्दगी का कोई खास पल जुड़ा हो, और कभी आगे चलकर आप उन्हें मिस करें. इसलिए अगर आपके पास थोड़ी जगह हो, तो कुछ पुरानी खास चीज़ों को सहेजकर रखें. हो सकता है कि उनकी रुपए-पैसों में कोई कीमत न हो, हो सकता है कि वे उपयोगी नहीं रही हों, हो सकता है कि अब उनका ज़माना न रहा हो… पर हो तो बहुत कुछ सकता है. ये भी हो सकता है कि आगे चलकर वो चीज़ें आपको एक गुज़र चुके ज़माने की याद दिलाएं, हो सकता है कि वो आपको पुरखों की धरोहर लगें, और हो सकता है कि आप उन्हें दूसरों को दिखाकर गर्व महसूस करें.
इसलिए कुछ खास पुरानी चीज़ों को संभालें, उन्हें वक्त की तेज़ धारा में बह न जाने दें. आखिर हम टिकट खरीदकर म्यूज़ियम में क्या देखने जाते हैं, यादों में लिपटी यही पुरानी चीज़ें!
धन्यवाद!
आपका
पवन अग्रवाल
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Ise pdker sukun mila
Wo purani chije jisse hmari mithi yade judi
Ho …..