दिवाली की रात फुलझड़ी जलाते तीन बच्चे

कम पटाखे, भरपूर दिवाली

फिर दिवाली आई और सोशल मीडिया पर फिर वही बहस छिड़ी – पटाखों का मतलब त्योहार मनाना या प्रदूषण बढ़ाना?

कुछ लोग कहते हैं पटाखे मत जलाओ, बिना पटाखे की दिवाली मनाओ… तो कुछ कहते हैं कि अपना ज्ञान अपने पास रखो, हम तो खूब पटाखे जलाएंगे।

अब दोनों में से क्या सही और क्या गलत? थोड़ा सा दोनों सही, थोड़ा सा दोनों गलत। क्योंकि मामला संतुलन का है। इसमें कोई शक नहीं कि जलने वाला हर पटाखा अपने पीछे ढेर सारा धुआं छोड़ जाता है, जो वातावरण को जहरीला बनाता है, लेकिन ये भी तो सोचने वाली बात है कि पर्यावरण की फिक्र करते समय अक्सर भारतीय हिंदू त्योहारों को ही क्यों कटघरे में खड़ा किया जाता है? यूरोप और अमेरिका में अक्सर जश्न पटाखे जलाकर मनाए जाते हैं, और पटाखे भी थोड़े नहीं, भर-भरकर। तो दिवाली पर चार फुलझड़ियां जला देने से कौन सा कहर टूट पड़ेगा?

तो भई, हम तो दिवाली मनाएंगे और वैसी ही मनाएंगे, जैसी हम मनाते आए हैं। लेकिन यहाँ भी थोड़ा रुककर सोचने की ज़रूरत है। अगर बात पटाखों की है, तो क्या आजकल हम वैसी दिवाली मना रहे हैं, जैसी कि हम मनाते आए हैं? ज़रा याद कीजिए अपना बचपन, जब आपके पिताजी आपको पटाखे दिलवाने बाज़ार लेकर जाते थे और लौटते वक्त उन पटाखों की थैली कितनी बड़ी या भारी होती थी? क्या वो उस झोले से कई गुना छोटी नहीं होती थी, जो आज आपके बच्चों के लिए आता है? अपने बचपन में आप दिवाली पर कितने पटाखे जलाते थे, और आज आपके बच्चे कितने पटाखे जलाते हैं? कुछ फ़र्क महसूस हुआ?

ये फ़र्क असल में बहुत बड़ा है। ये दौर अति उपभोग वाला है। टीवी, विज्ञापनों और झूठे नरेटिव्स ने हमारी सोच को बहुत बदला है। अब दिवाली हो या होली, गणेश उत्सव हो या करवा चौथ, बाज़ारवाद ने हमें गाफ़िल कर दिया है। हमारी जितनी हैसियत है, उससे कई गुना हम खर्च कर रहे हैं, क्योंकि बाज़ार ने हमारी जेब में कुछ सांप छोड़ दिए हैं, जो दिखने में बहुत प्यारे हैं – लाइफटाइम फ्री क्रेडिट कार्ड, पांच मिनट में पर्सनल लोन, कम ब्याज, आसान ईएमआई आदि-आदि।

सवाल चार फुलझड़ियों का होता तो कोई बात ही नहीं थी, पर क्या सचमुच ऐसा हो रहा है? अब तो हम पटाखे खरीदने के लिए थोक की दुकान ढूंढते हैं, क्योंकि हमें दिवाली बड़ी धूमधाम से मनानी है। सोशल मीडिया के उन ज्ञानियों को मुंहतोड़ जवाब देना है और पटाखों का जखीरा घर लाकर अपने बच्चों तथा पड़ोसियों की नज़र में हीरो बनना है।

मुझे अपना बचपन याद आता है, जब हम बच्चों की टोली मुट्ठीभर पटाखों से भी इतनी मज़ेदार दिवाली मना लेते थे, जो आज के बच्चे घर में पटाखों की दुकान लग जाने पर भी नहीं मना पाते। हम हर फुलझड़ी, हर सुतली बम, हर अनार और चकरी को इतने शौक से, इतने जतन से और इतनी मितव्ययिता से जलाते थे कि उनके बारूद का एक-एक कण हमें भरपूर मज़ा दे जाता था। उन दिनों दिवाली में मासूमियत थी, सादगी थी, मर्यादा थी। तब मिठाई या नमकीन बाज़ार से नहीं आते थे, घर में बनते थे। रसोई में सारा दिन कड़ाही-करछी चलती रहती थी और ये काम भी उत्सव का एक हिस्सा था। पर आज किचन सूने हैं और मिठाई-नमकीनों से दुकानें और सुपर-मार्केट भरे पड़े हैं। क्या बाज़ार से लाई गई चीज़ों में वो मिठास और तृप्ति मिलती है, जो घर की चीज़ों में होती है?

पहले दिवाली सामूहिक होती थी, पर आज व्यक्तिगत हो गई है। मेरा घर, मेरे पटाखे, मेरी रोशनी। और मेरा सब-कुछ बढ़-चढ़कर होना चाहिए। पर सोचिए, क्या आनंद चीज़ों के ढेर सारा होने में ही है? आपको दो या चार गुलाब-जामुन ज़्यादा मज़ेदार लगेंगे या बीस-चालीस? आपके बच्चे अपने पहले पिज़्ज़ा को जितना चाव से खाते हैं, क्या वो चौथे पिज़्ज़ा को उतने चाव से खा पाएंगे? इन चीज़ों की तरह पटाखे भी सीमित मात्रा में ही रुचिकर लगते हैं, बाद में तो बस एक औपचारिक प्रक्रिया भर रह जाती है और कई बार तो काफ़ी सारे पटाखे बच भी जाते हैं, क्योंकि वो ज़्यादा थे, अतिरिक्त थे, अनावश्यक थे।

अब सोचिए कि अगर आप अपने पटाखे थोड़े से कम कर लें, तो न केवल बढ़िया दिवाली मनेगी, बल्कि आपकी जेब का बोझ भी कम होगा और प्रदूषण भी कम होगा। अगर हम अपने बच्चों को मितव्ययिता रखना, थोड़े में संतुष्ट होना और कम चीज़ों का भरपूर मज़ा लेना सिखाएंगे, तो उनको सही संस्कार मिलेंगे और जब वे बड़े होंगे, तो आपकी सीखों के बल पर वे बाज़ार के जादूगरों और मायावी शक्तियों से खुद को सुरक्षित रख पाएंगे और उनका जीवन एक खुशहाल दिवाली की तरह होगा।

तो दिवाली मनाएं, पटाखों के साथ मनाएं, पर अतिवादी बनकर नहीं, आनंदवादी बनकर।

दिवाली की शुभकामनाएँ!

आपका

पवन अग्रवाल

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1 thought on “कम पटाखे, भरपूर दिवाली”

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